Tuesday, July 23, 2024
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Makar Sankranti 2024: अलग-अलग राज्यों में किस नाम से मनाई जाती है मकर संक्रांति?

Makar Sankranti 2024: मकर संक्रांति का त्योहार पूरे देश में बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है. यह त्योहार हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस पर्व को नए फल और नई ऋतु के आगमन के लिए मनाया जाता है. जब सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तब मकर संक्रांति मनाई जाती है. इस दिन लाखों श्रद्धालु गंगा और अन्य पावन नदियों के तट पर स्नान और दान करते हैं.

अगले साल मकर संक्रांति का पर्व पौष माह यानी 15 जनवरी 2024 को मनाया जाएगा. माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने कहा था कि जो मनुष्य इस दिन अपने देह को त्याग देता है तो उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. हिंदू धर्म के सभी पर्व हर राज्य में मनाए जाते हैं परन्तु मकर संक्रांति के पर्व की बात अलग ही होती है. मकर संक्रांति को हर राज्य में अलग अलग नामों से जाना जाता है और अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है.

उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति के पर्व को दान का पर्व कहा जाता है. मान्यता है कि मकर संक्रांति से पृथ्वी पर अच्छे दिनों की शुरुआत होती है. मकर संक्रांति के दिन स्नान के बाद दान देने की परंपरा है. इस दिन गंगा घाटों पर मेलों का भी आयोजन किया जाता है.

पंजाब और हरियाणा

पंजाब और हरियाणा में इसे 15 जनवरी से एक दिन पहले ही मनाया जाता है. वहां पर इसे ‘लोहड़ी पर्व’ के रूप में मनाया जाता है. इस दिन अग्निदेव की पूजा करते हुए तिल, गुड़, चावल और भुने मक्के की अग्नि में आहुति दी जाती है. यह पर्व नई दुल्हनों और नवजात बच्चों के लिए बेहद खास होता है. सभी एक दूसरे को तिल की मिठाइयां खिलाते हैं और लोहड़ी लोकगीत गाते हैं.

पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल में इस पर्व पर गंगासागर पर बहुत बड़े मेले का आयोजन किया जाता है. यहां पर इस पर्व के दिन स्नान करने के बाद तिल दान करने की प्रथा है. कहा जाता है कि इसी दिन यशोदा जी ने श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिए व्रत रखा था. साथ ही इसी दिन मां गंगा भगीरथ के पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए गंगा सागर में जाकर मिली थीं.

बिहार

बिहार में मकर संक्रांति को ‘खिचड़ी पर्व’ के नाम से जाना जाता है. यहां उड़द की दाल, चावल, तिल, खटाई और ऊनी वस्त्र दान करने की परंपरा है. बिहार में मकर संक्रांति का खास महत्व होता है और यहां लोगों में इस पर्व को लेकर अलग उत्साह देखने को मिलता है.

असम

असम में इसे माघ बिहू और भोगाली बिहू के नाम से जानते हैं. वहीं, तमिलनाडू में तो इस पर्व को 4 दिनों तक मनाते हैं. यहां पहला दिन ‘भोगी पोंगल’, दूसरा दिन ‘सूर्य पोंगल’, तीसरा दिन ‘मट्टू पोंगल’ और चौथा दिन ‘कन्या पोंगल’ के नाम से जाना जाता है.

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